संस्थागत परिसरों, उद्योगों, कॉर्पोरेट कार्यालयों, सार्वजनिक उद्यानों, क्लबों एवं समान स्थलों में आगामी वर्षा ऋतु के दौरान वृक्षारोपण हेतु सामान्य मार्गदर्शिका - विजय रत्न खरे एवं ब्रह्मचारी गिरीश
जैसा कि हम सभी जानते हैं, हरियाली हमारे चारों ओर एक अधिक उत्तम, शुद्ध, ताज़ा एवं प्राकृतिक वातावरण निर्मित करने हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है।अतः इस वर्षा ऋतु में वृक्षारोपण कार्य करते समय निम्नलिखित बिंदुओं का ध्यान रखना आवश्यक है:
(A) लगाए जाने वाले पौधों की प्रजातियाँ –
फूलदार, शोभायमान पौधे एवं बेलों को परिसर में अधिक संख्या में, सीमा रेखा के सहारे तथा खुले स्थानों में लगाया जाना चाहिए। फूलों, शोभायमान एवं फलदार पौधों की सूची निम्न प्रकार है:
पुष्पीय पौधे: चांदनी, चंपा, अमलतास, गुलमोहर, जकरांडा, गुलतारा, झरूल (Lagerstroemia flos-reginae) (गुलाबी या बैंगनी रंग), हिबिस्कस बहुपंखुड़ी (तीन रंग—पीला, लाल एवं नारंगी), कनेर बहुपंखुड़ी (चार रंग—लाल, पीला, सफेद एवं गुलाबी), सापथोडिया कैम्पैनुलाटा (लाल पुष्प) एवं टेबूबिया अर्जेन्टियाना (पीले पुष्प) आदि।
शोभायमान पौधे: बॉटल पाम, मौलश्री, अशोक, पॉलियाल्थिया पेंडुला (पेंडुला अशोक), करंज, सप्तपर्णी (Alstonia scholaris) एवं अन्य।
फलदार पौधे: जामुन, चीकू, बादाम, आम, अमरूद, आंवला एवं खिरनी (यदि पर्याप्त बड़ा स्थान उपलब्ध हो) एवं अन्य।
B) अतिरिक्त खुले स्थान का उपयोग –
यदि कोई बड़ा खुला स्थान शेष रह जाता है, तो उसे वार्षिक अनुबंध पर पुष्प कृषि एवं/अथवा औषधीय पौधों की खेती हेतु दिया जाना चाहिए, जो एक वर्षीय प्रकृति के होते हैं अर्थात एक वर्ष में तैयार होकर प्राप्त किए जा सकते हैं। इससे परिसर की शोभा एवं आय दोनों में वृद्धि होगी कुछ औषधीय पौधे जो उगाए जा सकते हैं वे हैं—मेंथा, सफेद मूसली, सर्पगंधा, अश्वगंधा, कोलियस आदि।
(C) पौधों की प्रजाति एवं स्थान चयन हेतु ध्यान देने योग्य बिंदु –
ऐसे पौधे, जो 10 फीट से अधिक ऊँचे होते हैं, भवन के पूर्व दिशा में न लगाए जाएँ।
पौधों को भवन के अत्यधिक निकट न लगाया जाए। यदि सीमा दीवार स्तंभ एवं बीम पर है तो पौधे लगभग 1.5 मीटर दूरी पर लगाए जाएँ। यदि सीमा दीवार साधारण प्लिंथ पर है तो पौधे लगभग 2.5 मीटर दूरी पर लगाए जाएँ।
यदि सीमा दीवार के बाहर कृषि भूमि लगी हो, तो पौधे और अधिक दूरी पर अर्थात लगभग 2.5 मीटर पर लगाए जाएँ, जिससे भविष्य में पौधों की छाया से किसान की कृषि उपज प्रभावित न हो।
खेल मैदान की सीमा के किनारे वृक्षों को थोड़ा हटकर लगाया जाए, जिससे खिलाड़ी खेलते समय उनसे टकराएँ नहीं।
दूध जैसा रस (लेटेक्स) युक्त पौधे जैसे रबर, बरगद, दूधी आदि परिसर में कहीं भी न लगाए जाएँ।
काँटेदार एवं दूधिया रस वाले पौधे अथवा कैक्टस परिसर में न लगाए जाएँ।
जो पौधे भविष्य में बड़े वृक्ष बनेंगे, उन्हें भवन से पर्याप्त दूरी रखते हुए पश्चिम एवं दक्षिण दिशा में लगाया जाए, तथा पूर्व एवं उत्तर दिशा में नहीं लगाया जाए।
(D) रोपण प्रक्रिया –
पौधे प्रायः पॉलीथीन थैलियों में प्राप्त होते हैं। जहाँ जड़ एवं तना मिलते हैं, उस स्थान को “कालर” कहा जाता है।
सामान्यतः जिस गड्ढे में पौधा लगाया जाना है, वह पॉलीथीन बैग के आकार से अधिक गहरा खोदा जाता है।
पौधा लगाने से पूर्व उसे एक हाथ की हथेली पर इस प्रकार रखा जाए कि पूरा पॉलीथीन बैग हथेली पर आजाए। तत्पश्चात तेज ब्लेड या चाकू से एक ओर से पॉलीथीन काटकर हटाया जाए, जिससे पौधे के चारों ओर की मिट्टी सुरक्षित बनी रहे।
गड्ढे में मिट्टी इस स्तर तक भरी जाए कि जब पौधा रखा जाए तो उसका कालर भूमि स्तर पर रहे, अर्थात न तो भूमि से ऊपर और न ही नीचे।
पौधे को पकड़कर गोबर खाद मिश्रित मिट्टी उसके चारों ओर डाली जाए तथा हल्के दबाव से सघन किया जाए। रोपण के पश्चात पौधे की सिंचाई की जाए।
(E) पौधों की उपलब्धता –
पौधों की प्राप्ति हेतु स्थानीय प्रभागीय वन अधिकारी अथवा उप निदेशक (कृषि/उद्यानिकी) से आवश्यक सहायता प्राप्त की जाए।
कुछ राज्यों जैसे मध्य प्रदेश एवं हरियाणा में वन विभाग द्वारा पौधे एवं रोपण हेतु सहायता प्रदान की जातीहै। कृपया इसका लाभ लिया जाए। अनेक गैर-सरकारी संगठन (NGOs) भी निःशुल्क पौधे/कम्पलिंग उपलब्ध कराते हैं।
कृपया केवल उत्तम गुणवत्ता एवं स्वस्थ पौधे ही क्रय किए जाएँ। इस वर्षा ऋतु में अधिकतम पौधे लगाए जाएँ। यह समस्त समाज के लिए एक महान सामाजिक सेवा होगी।
आप सभी को हमारे प्रिय भारतवर्ष की इस उत्कृष्ट सेवा हेतु हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बहुत-बहुत धन्यवाद।
जय गुरु देव, जय महर्षि, जय भारत।
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