भारतीय ज्ञान और भारतीयों की सुरक्षा - ब्रह्मचारी गिरीश
भारतीय शाश्वत
सनातन वेद विज्ञान
का ज्ञान वेद
भूमि, देव भूमि,
पुण्य भूमि भारतवर्ष
के सिद्ध साधक
तपस्वी ऋषियों, मुनिओं,
महाऋषिओं, राजर्षिओं और ब्रह्मर्षिओं
द्वारा कठिन साधना
व तप से प्राप्त किया गया,
संरक्षित किया गया,
संवर्धित किया गया
और संपूर्ण विश्व
के जनमानस के
कल्याण हेतु जनसामान्य को उपलब्ध
कराया गया। भगवान
आदि शंकराचार्य जी
ने भारत के उत्तर दक्षिण
पूर्व और पश्चिम
में चार पीठों
की स्थापना करके
ज्ञान विज्ञान के
स्थायी प्रचार प्रसार
और विस्तार का
प्रबंध किया। वर्तमान में भी अनेकानेक भारतीय साधू,
संत, महात्मा, सन्यासी,
विद्वान, कथाकार, महंत, मंडलेश्वर,
महा मंडलेश्वर इस
पावन कार्य में
सतत व्यस्त हैं। भारतीय
ज्ञान भारतवर्ष की
सीमायें पारकर सम्पूर्ण विश्व में
पहुँच चुका है और इसका
लाभ उठाकर विश्व परिवार
के करोड़ों सदस्य
अपने जीवन को सार्थक और
धन्य बना रहे हैं।
विश्व के
अनेक देशों में
स्वयंभू ज्ञानिओं, नकलचियों,
व्यावसायिक मानसिकता वाले स्वार्थी
तत्त्वों की बहुतायत
हो रही है। उन्हें भारत
में ज्ञान और
साधना के क्षेत्र
में भी बाजार
की संभावना दिख
रही है। अनेक
भारतीय धार्मिक और
आध्यात्मिक संस्थाओं में ऐसे तत्व अपनी
वाक्पटुता का दुरूपयोग
करके या सोशल मीडिया के माध्यम से
या तो येन केन
प्रकारेण प्रवेश कर
गए हैं या तीव्रता से प्रवेश
करने की जुगत में हैं।
भारत के भोले भाले नागरिक
विदेशी आकर्षण के
प्रभाव में शीघ्र
आ जाते हैं।
उन्हें सत्य असत्य
की वास्तविकता का
पता नहीं होता।
ज्ञान देने, योग
अथवा ध्यान सिखाने,
वैदिक शिक्षा के
नाम पर ऐसे अज्ञानी व्यक्ति भारतीयों
को भ्रमित कर
रहे हैं, उन्हें
वास्तविक अध्यात्म, स्वधर्म, सत्मार्ग
से भटका रहे
हैं। यह सब एक विशेष
सुनियोजित षड़यंत के अंतर्गत किया जा रहा है।
यह उसी तरह का षड़यंत
है जैसा कि कुछ सौ
वर्षों पूर्व भारतीय
ज्ञान विज्ञान को
हानि पहुँचाने या
मिटा देने के लिए रचा
गया था। धन्य
हैं वे भारतीय
विद्वान और नागरिक
जिन्होंने उस षड़यंत्र
को समझा और भारतीय ज्ञान
की सुरक्षा की,
इसे परंपरागत रूप
से अक्षुण बनाये
रखा और इसके अध्ययन अद्ध्यापन
की विधिवत व्यवस्था
की।
आप सभी
माननीयों को, विशेष
रूप से वैदिक
गुरुकुलों के आचार्यों,
वैदिक विद्वानों, आध्यात्मिक
और धार्मिक संस्थानों
के प्रबंधकों, संचालकों
को स्वयं भी
अत्यंत सजग, सचेत
और सावधान रहने
की आवश्यकता है
और अपने अपने
क्षेत्र के नागरिकों
को भी इस विषय की
सूचना देकर उन्हें
सावधान करने की आवश्यकता है। इस तरह के
अज्ञानी या भारत को ज्ञान
या योग का बाजार समझकर
या भारतीय ज्ञान
विज्ञान को किसी भी तरह
से हानि पहुंचाने
वाली मानसिकता से,
थोड़ा सा पुस्तकीय
ज्ञान प्राप्त करके
या भारतीय आचार्यों
की नकल करके
स्वयंभू ज्ञानी घोषित
होकर भारत में
आने वालों से
अपने भारत वासियों
को बचाने के
लिए हमें तत्काल
सक्रिय होने की आवश्यकता है।
कृपया अपने
क्षेत्र के नागरिकों
को सूचित करें
कि यदि इस तरह के
व्यक्ति उनके क्षेत्र
के व्यक्तियों, संस्थानों,
विद्यालयों, महाविद्यालयों अथवा विश्वविद्यालयों
में संपर्क करें,
तो ऐसे व्यक्तियों
से उनकी शैक्षणिक
योग्यता, अनुभव, उनकी
गुरु परंपरा और
उनके तत्सम्बन्धी प्रमाण
पत्रों की मांग करें, उनकी
जाँच अवश्य करें।
यदि आवश्यकता प्रतीत
हो तो उनके पासपोर्ट में भारतीय
दूतावास द्वारा स्टैम्प
लगाए गए वीसा
(भारत में आने की अनुमति)
की भी जाँच करें और
स्थानीय फॉरेन रजिस्ट्रेशन
कार्यालय से सुनिश्चित
करें कि वह व्यक्ति योग्य है
और शिक्षण करने
के लिए अधिकृत
है।
हम सब
को मिलकर अपने
राष्ट्र की बहुमूल्य
वैदिक धरोहर को
सुरक्षित रखना है।
इसे आक्रांताओं से
बचाना है और इस जीवन
परक ज्ञान को
सम्पूर्ण विश्व परिवार
तक पहुँचाना है।
उत्तम तो यह होगा कि
हम अपने आगे
आने वाली पीढ़ियों
को भारतीय वैदिक
ज्ञान स्वयं दें,
पूर्ण ज्ञानी वैदिक
आचार्यों से ही
दिलवाएं, अर्धज्ञानी स्वयंभू विद्वानों से अपने भारतीयों को भ्रमित न
होने दें।
इस पुनीत कार्य में आपके बहुमूल्य योगदान के लिए हम हृदय से आभारी हैं और सादर धन्यवाद करते हैं। जय गुरुदेव, जय महर्षि, जय भारत
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