सर्वदेवमयी गौमाता
कल्याण, जून 2026 के अंक से साभार
गौ के आधिदैविक स्वरूप पर शास्त्रदृष्टि से विचार किया जाये तो पता लगता है कि
उसके प्रत्येक अंग में, किंबहुना रोम-रोम में देवताओं का निवास स्थान है। इसीलिये कहा
गया है-
सर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरलंकृते ।
मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दिनि ।।
शास्त्रदृष्ट्या गोमाता पशु नहीं है, तिल सामान्य अन्न नहीं है- ‘तिलं न धान्यं
पशवो न गावः।’ गोदुग्ध की अमृत संज्ञा है। अधिक क्या, गौ का मूत्र और गोबर अपवित्र
देह को पवित्र बनाते हैं; अपवित्र स्थान को पवित्र बनाने के लिये भी गोमूत्र और गोमय
का प्रोक्षण और लेपन किया जाता है। जिस स्थान पर गौमाता का निवास होता है, वह स्थान
सर्वदेवमय और सर्वतीर्थमय होने से पवित्र हो जाता है। गोदान करने से पापनिष्कृति तो
सहज है ही; पुण्य की भी सीमा नहीं है।
महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में भगवान् श्रीकृष्ण गोमाता के सर्वदेवमय और सर्वतीर्थमय
स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं-
‘हे राजन्! जिस समय अग्निहोत्री ब्राह्मण को कपिला गौ दान में दी जाती है, उस
समय उसके सींगों के ऊपरी भाग में विष्णु और इन्द्र निवास करते हैं। सींगों की जड़ में
चन्द्रमा और वज्रधारी इन्द्र रहते हैं। सींगों के बीच में ब्रह्मा तथा ललाट में भगवान्
शंकर का निवास होता है। दोनों कानों में अश्विनी कुमार, नेत्रों में चन्द्रमा और सूर्य,
दाँतों में मरुद्गण, जिह्वा में सरस्वती, रोमकूपों में मुनिगण, चर्म में प्रजापति एवं
श्वासों में षडंग पद और क्रम सहित चारों वेदों का निवास है।
‘नासिका-छिद्रों में गन्ध और सुगन्धित पुष्प, नीचे के ओठ में सब वसुगण तथा मुख
में अग्नि निवास करते हैं। कक्ष में साध्य देवता, गरदन में पार्वती, पीठ पर नक्षत्रगण,
ककुद् के स्थान में आकाश, अपान में सारे तीर्थ, मूत्र में साक्षात् गंगा जी तथा गोबर
में आठ एैश्वर्यो से सम्पन्न लक्ष्मी जी रहती है। नासिका में परम सुन्दरी ज्येष्ठा
देवी, नितम्बों में पितर एवं पूँछ में भगवती रमा रहती हैं। दोनों पसलियों में सभी विश्वेदेव
स्थित हैं और छाती में प्रसन्नचित्त शक्तिधारी कार्तिकेय रहते हैं। घुटनों और ऊरुओं
में पाँच वायु रहते हैं, खुरों के मध्य में गन्धर्व और खुरों के अग्रभाग में सर्प निवास
करते हैं। जल से परिपूर्ण चारों समुद्र उसके चारों स्तर हैं’
पूर्वकाल में स्वयम्भू ब्रह्माजी ने अग्निहोत्र तथा ब्राह्मणों के लिये सम्पूर्ण
तेजों का संग्रह करके कपिला गौ को उत्पन्न किया था। कपिला गौ पवित्र वस्तुओं में सबसे
बढ़कर पवित्र, मंगलजनक पदार्थो में सबसे अधिक मंगलकारिणी तथा पुण्यों में परम पुण्यस्वरूपा
है। वह तपस्याओं में श्रेष्ठ तपस्या, व्रतों में उत्तम व्रत, दानों में श्रेष्ठ दान
और सबका अक्षय कारण है। पृथ्वी पर जितने पवित्र तीर्थ और मन्दिर हैं तथा संसार में
जो कुछ पवित्र और रमणीय वस्तुएँ हैं, उन सबका तेज निकालकर विश्वविधाता ब्रह्मा जी ने
जगत् को तारने के लिये कपिला गौ की सृष्टि की है। कपिला सम्पूर्ण तेजों का पुंज है।
वह अमृतस्वरूप, मेध्य, शुद्ध, पवित्र करने वाली और उत्तम है।
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