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Friday, July 3, 2026

हेयम् दुःखम् अनागतम् - ब्रह्मचारी गिरीश

 हेयम् दुःखम् अनागतम् - ब्रह्मचारी गिरीश

योग हमें यह बताता है कि हम अपने अंदर की नकारात्मकता से कैसे बाहर निकलें। योग हमें मानसिक रूप से समर्थ बनाता है कि हम अपनी दिशा स्वयं निर्धारित कर सकें। योग हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है और अपनी चेतना के विस्तार में हमारी मदद करता है। योग के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है, 'योग का लक्ष्य ही है कि दुःख आए, इससे पहले ही वह समाप्त हो जाए।' क्रोध, ईर्ष्या, कुंठा, घृणा सभी का निवारण कर नवजीवन की ओर बढ़ना ही योग है।

आपने देखा होगा कि जब आप प्रसन्न होते हैं तो आप स्वयं को विस्तारित हुआ अनुभव करते हैं और जब अपमानित या असफल होते हैं तो अपने अंदर कुछ कम होता हुआ अनुभव होता है। हमारे अंदर जो भी संकुचित होने या विस्तारित होने की घटना घट रही है, योग हमें उसका साक्षी बनाता है। हम अपनी नकारात्मक भावनाओं के प्रति बहुत ही असहाय अनुभव करते हैं। कभी भी स्कूल या घर पर किसी ने नहीं सिखाया कि इन नकारात्मक भावनाओं से पार कैसे पाया जाए। यदि आप परेशान हैं तो परेशान ही रहते हैं या फिर उत्तम समय के प्रतीक्षा करनी होती है। योग में वह रहस्य है, जो आपको इसके लिए तैयार कर सकता है। यह आपके मन को स्वतंत्र कर देता है।

योग इस तरह से आपका निर्माण कर देता है कि जिस दिशा में आप सोचना चाहें, वह आप सहजता से कर सकते हैं। यह हमें और अधिक उत्तरदायी बनाता है। यह कर्म योग कहलाता है। हम अपने जीवन में कई चरित्र निभाते हैं। हमारे पास यह विकल्प है कि हम उसे योगी की तरह बिताएं या फिर एक साधारण दुःखी व्यक्ति की भांति। एक-दूसरे की देखभाल, मिल कर रहना और उत्तरदायित्वों का निर्वहन, सब कुछ योग के माध्यम से संभव है। योग से ऊर्जा बढ़ोत्तरी और उत्साह का जन्म होता है यही हमें अधिक उत्तरदायित्वों को लेने के लिए प्रेरित करता है। अगर आपके पास ऊर्जा तथा उत्साह है तो आप उत्तरदायित्वों को उठा सकते हैं और इसमें आपको बोझ भी नहीं लगेगा। यदि आप किसी भी विवाद की जड़ में होते हैं तो पाते हैं कि उसमें तनाव, अविश्वास और भय ही है। योग इन तीनों को दूर करने में सहायता करता है। भय तो तब दूर हो जाता है, जब आप अपने चिंतन को विस्तृत करते हैं और अपनी चेतना का विस्तार करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपना अंग समझते हैं।

योग के आठ अंग हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इसमें से एक है योगासन, लेकिन इसका केन्द्रीय तत्व है मन की स्थिति को समता में बनाए रखना। यदि आप कोई कार्य मन से करते हैं, तब आपको पता होता है कि आप क्या कह या कर रहे हैं और यही आपको योगी बनाता है। विज्ञान एक व्यवस्थित और तार्किक समझ का पर्याय है। इसीलिए योग भी एक विज्ञान है। यह जानना कि, यह क्या है, विज्ञान है और यह जानना कि 'मैं कौन हूँ', अध्यात्म है। लेकिन दोनों ही विज्ञान हैं।

योग का समस्त विज्ञान योगी और बच्चे में अवश्य होता है। बच्चे सोते समय विभिन्न मुद्रायें बनाते हैं, विश्व के हर बच्चे में आप देखेंगे कि लेटते हैं तो पहले पैर उठाते हैं और फिर कंधे, कोबरा सर्प की तरह रखते हैं। आपको एक योग शिक्षक की आवश्यकता नहीं होगी, यदि आप एक बच्चे को देखेंगे। जिस प्रकार बच्चे श्वास लेते हैं, वह वयस्क लोगों से अलग होता है। यह श्वास ही है, जो शरीर और भावनाओं के मध्य सेतु का कार्य करती है। यदि हम श्वास पर ध्यान दें तो हम अपनी भावनाओं को भी नियंत्रित कर सकते हैं और नकारात्मकता से दूर रह सकते हैं।

एक योगी होने की निशानी है कि हम फिर से एक बच्चा बन जाएं। योग का उद्देश्य ही है कि दुःख आए, इससे पहले ही वह समाप्त हो जाए। सभी को समाहित कर नवजीवन की ओर बढ़ना योग है। महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान योग शैली, आधुनिक जीवनशैली को आनंदित करते हुए उसे ऊर्जावान व प्रगतिवान बनाने के लिए एकमात्र विकल्प के रूप में विश्व के सौ से भी अधिक देशों में प्रसारित है जो महर्षि महेश योगी जी के ध्येय वाक्य 'जीवन आनंद है' का पर्याय है। वर्तमान समय की अव्यवस्थित व अतिव्यस्त जीवन शैली में हम प्रकृति, समाज, परिवार से तो दूर हो ही रहे हैं साथ ही हम स्वयं से भी दूरी बढ़ा रहे हैं और यह दूरी ही हमारे जीवन से आनंद को दूर कर रही है। अतः हम ज्यों-ज्यों स्वयं के निकट आयेंगे स्वतः ही परिवार, समाज व प्रकृति को स्वयं के समीप पायेंगे। अतः स्वयं को स्वयं से मिलाना ही योग है।

जय गुरुदेव, जय महर्षि, जय भारत।

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