गुरू से हमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश, तीनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है - ब्रह्मचारी गिरीश
"परम पूज्य महर्षि महेश
योगी जी कहा करते थे कि उनके गुरुदेव का नाम ब्रह्मानन्द था अर्थात् ब्रह्म का आनन्द।
जब हम ब्रह्म की बात करते हैं तो पूर्ण ज्ञान की बात करते हैं। ज्ञान में ही क्रियाशक्ति
होती है। क्रिया शक्ति जागृत हो जाती है तो आनन्द का अविरल प्रवाह होने लगता है। हमारे
लिए एक तरफ गुरुदेव के रूप में ब्रह्म है तो दूसरी तरफ उनके प्रिय शिष्य महेश। इस तरह
हमें अपने गुरू ब्रह्मानन्द सरस्वती जी से ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का आशीर्वाद
प्राप्त होता है। यह सारे गुण हमारी चेतना में जागृत हो जाते हैं। परा प्रकृति में
स्थित होकर कर्म करने की शक्ति भी जागृत हो जाती है। यह सब हमें अपनी वैदिक गुरू परम्परा
से अर्जित हुआ है।" महर्षि जी के तपोनिष्ठ शिष्य ब्रह्मचारी गिरीश ने आगे कहा
कि "एकहि साधे सब सधे अर्थात् हमें ‘मास्टर की’ मिल गई है, यह समूचे अखिल ब्रह्माण्ड
की चाभी है। गुरूदेव ब्रह्मानन्द सरस्वती जी के बारे में इतनी बातें हैं कि उनकी गाथा
को गाते हुए एक पूरा मानव जीवन कम पड़ जाये। उन्होंने 9 वर्ष की आयु में घर छोड़ दिया
था एवं 14 वर्ष की आयु में सन्यास ले लिया था। वह 71 वर्ष की आयु में 1941 में शंकराचार्य
बने और जो अद्वितीय कार्य लगभग 13 वर्ष के संक्षिप्त समय में उन्होंने किये वह सदैव
अविस्मरणीय रहेंगे। 1942 में गुरूदेव ने नई दिल्ली में यमुना के किनारे यज्ञ किया जिसमें
10,000 से अधिक वैदिक पंडितों ने हिस्सा लिया। इसके पश्चात् भारत को स्वतंत्रता प्राप्त
हुई। इन्हीं गुरू ने पूरे विश्व को एक अमूल्य भेंट दिया, वह हैं महर्षि महेश योगी जिन्होंने
सम्पूर्ण विश्व को आलोकित किया।इन्हीं महर्षि महेश योगी जी ने घोषित किया था कि भारत
तो ज्ञान के मामले में जगतगुरु है ही, लेकिन हम सब मिलकर भारत को विश्व का सर्वाधिक
शक्तिशाली राष्ट्र बनायेंगे। महर्षि जी सच्चे अर्थों में महर्षि, राजर्षि एवं ब्रह्मर्षि
भी थे। आज इतने वर्षों में रोपित यह पौधा वृक्ष हो गया है और इसमें फूल आने लगे हैं
लेकिन फल आने में अभी समय लगेगा। तब तक हम सभी मालियों का कार्य है कि हम उस वृक्ष
को खाद पानी देते रहें एवं रख रखाव करते रहें। अनेकों वर्ष पूर्व महर्षि द्वारा कही
गई बातें आज सार्थक एवं साकार होते दिख रही हैं। यही कारण है कि आज भारत के प्रधान
मंत्री द्वारा कही गई प्रत्येक बात को पूरा विश्व समुदाय गम्भीरता से लेता है और उन्हें
ऐसा ही सम्मान देता है जैसा कि महर्षि जी ने चाहा था।"
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